Sant Ravidas ji aur Vishnu ji Story
Sant Ravidas ji aur Vishnu ji story defines beautifully:
Sant Ravidas ji aur Vishnu ji Story Part 1:
जन्म और आत्मा की पुकार
काशी की पवित्र भूमि, जहाँ मंदिरों की घंटियां हर सुबह ईश्वर के नाम की गूंज भरती थीं, वहीं एक संकरे गली के कोने में बसी थी एक छोटी-सी झोंपड़ी। यही थी वह जगह जहाँ संत रैदास जी का जन्म हुआ — एक साधारण परिवार में, लेकिन असाधारण आत्मा के साथ।
उनके पिता, संतोख दास जी, पेशे से जूते बनाने वाले थे — एक ऐसा कार्य जिसे समाज तुच्छ और अपवित्र मानता था। लेकिन वही हाथ जब रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठते, और अपने काम से पहले प्रभु का नाम लेते, तो वह झोंपड़ी मंदिर से भी ज़्यादा पवित्र प्रतीत होती थी।
रैदास जी बचपन से ही कुछ अलग थे। जहाँ अन्य बच्चे खेल में मग्न होते, रैदास मिट्टी में बैठकर अपने हाथों से छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाते और उन्हें सच्चे मन से प्रणाम करते। एक दिन, जब वे मात्र सात वर्ष के थे, उन्होंने अपनी माँ से पूछा—“माई, ये भगवान कहाँ रहते हैं? जो मंदिर में हैं, क्या वे हमें सुनते हैं?”माँ मुस्कराईं, लेकिन उनके पास उत्तर नहीं था। पर उस मासूम प्रश्न ने ब्रह्मांड को झकझोर दिया।
रात को जब रैदास जी सोए, उन्होंने एक अद्भुत सपना देखा। सपने में एक तेजस्वी पुरुष खड़े थे — नीले वर्ण, कमलनयन, चार भुजाओं वाले। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म था। “रैदास,” उन्होंने मधुर वाणी में कहा, “तेरी आत्मा बहुत पुरानी है। तू मेरा सेवक है। तू इस धरती पर आया है लोगों को सच्चे प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाने।” रैदास भयभीत भी थे और आश्चर्यचकित भी।“भगवान… क्या आप विष्णु हैं?” उन्होंने काँपती आवाज़ में पूछा।
“हाँ,” उन्होंने कहा, “लेकिन मैं तुझमें भी हूँ, और हर उस व्यक्ति में भी, जिसे समाज ने त्याग दिया है।”सुबह जब वे उठे, तो उनके हृदय में एक अद्भुत शांति थी — मानो अब जीवन का उद्देश्य स्पष्ट हो गया हो। जैसे-जैसे रैदास बड़े हुए, समाज का कटु व्यवहार भी गहरा होता गया। स्कूल में ब्राह्मण लड़के उनके पास नहीं बैठते। मंदिरों में उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं थी। लेकिन रैदास जी ने कभी किसी से बैर नहीं किया।वे हर सुबह घर के बाहर बैठकर प्रभु का नाम जपते, और कभी-कभी गली में बहते पानी को देखकर कहते—
“हे हरि, तू इस पानी की तरह है — सबको छूता है, लेकिन किसी को गंदा नहीं करता। तो तू मुझ जैसे चमार को भी उतना ही प्यारा क्यों नहीं मानता जितना किसी ब्राह्मण को?” उनकी आँखों में प्रश्न नहीं, प्रेम था। रैदास जी ने अपने पिता का काम संभाल लिया — जूते बनाना। लेकिन उनके लिए यह काम केवल जीविका नहीं था। वे हर जोड़ी जूते को बनाते समय मन ही मन प्रभु का नाम लेते — जैसे वह चर्म नहीं, बल्कि फूलों से बनी हो।
एक दिन एक ब्राह्मण ग्राहक ने उनका मज़ाक उड़ाया — “अरे, जूता बनाने वाले, तू भगवान का नाम क्यों लेता है? तू भगवान को नहीं समझता!”रैदास जी ने मुस्कराकर कहा—“भैया, यदि मन चंगा हो, तो कठौती में भी गंगा होती है। मेरा कर्म ही मेरी पूजा है।” यह बात उस ब्राह्मण को तो नहीं समझ आई, लेकिन उस दिन भगवान विष्णु स्वर्गलोक से मुस्कराए।
जब रैदास जी ने सच्चे मन से भगवान विष्णु को पुकारा, तो ब्रह्मांड ने सुना। स्वर्ग में, लक्ष्मी जी ने विष्णु से पूछा, “प्रभु, आप इतना व्याकुल क्यों दिखते हैं?” विष्णु बोले, “पृथ्वी पर मेरा एक प्रिय भक्त जन्म ले चुका है — रैदास। मुझे उसके पास जाना है।” लक्ष्मी जी ने पूछा, “क्या वह ब्राह्मण है?” विष्णु मुस्कराए — “नहीं, वह चर्मकार है। लेकिन उसका मन ब्राह्मणों से भी शुद्ध है। अब समय आ गया है कि संसार को बताऊं — ईश्वर जाति नहीं देखता, केवल भक्ति देखता है।” एक दिन, जब रैदास जी गली में बैठे अपने पुराने औज़ारों से एक गरीब स्त्री के लिए जूते बना रहे थे, तभी उन्हें पुनः वह दिव्य दृष्टि मिली। सामने वही भगवान विष्णु खड़े थे — इस बार जागती आँखों से।
“रैदास,” भगवान बोले, “तेरी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ। आज से तू केवल जूते बनाने वाला नहीं, बल्कि आत्माओं को जोड़ने वाला संत होगा।”रैदास जी ने कहा— “प्रभु, यदि आप मुझ जैसे को अपनाते हैं, तो दुनिया में कोई पराया नहीं।” भगवान ने अपना आशीर्वाद दिया और अंतर्ध्यान हो गए।वह दिन इतिहास बन गया। एक चर्मकार अब संत रैदास कहलाया।
Sant Ravidas ji aur Vishnu ji Story Part 2:
समाज की बेड़ियां और भगवान की छाया
काशी का नगर… मंदिरों की नगरी, लेकिन साथ ही सामाजिक भेदभाव की दीवारों से घिरी एक ऐसी भूमि, जहाँ ईश्वर को तो सब पूजते थे, परंतु उसी ईश्वर के भक्त को जाति के आधार पर नकार दिया जाता था।
संत रैदास जी अब बालक नहीं रहे थे। उनका व्यक्तित्व एक साधु का सा था — आँखों में भक्ति की ज्वाला, मन में करूणा और शब्दों में सच्चाई। लेकिन समाज उन्हें अब भी चर्मकार समझता था, और उनके भगवा वस्त्र, प्रभु भक्ति, और गहरी साधना से चिढ़ने लगा था। हर दिन कोई न कोई उन्हें ताना देता “अरे चमार, तू कौन होता है हमें धर्म सिखाने वाला?” ,“भक्ति तो ब्राह्मणों का काम है, तेरे जैसे नीच को नहीं साजती!”
रैदास जी चुप रहते। उनकी प्रतिक्रिया केवल एक मुस्कान होती। वो कहते — “मैं किसी से बड़ा नहीं, न किसी से छोटा — बस ईश्वर का दास हूँ।” एक दिन, जब वे गंगा किनारे प्रभु का ध्यान कर रहे थे, एक समूह आया — कुछ पंडित, समाज के ठेकेदार। उन्होंने कहा:“हमने सुना तू उपदेश देता है? तेरा स्थान तो मंदिर के बाहर भी नहीं!” रैदास जी ने हाथ जोड़कर कहा:“मंदिर भगवान का है, और भगवान सबका है। मैं बाहर भी बैठ जाऊँगा, प्रभु भीतर तक पहुंचा देंगे।” उस रात, विष्णु जी स्वयं बैकुंठ में चिंतित हो उठे। लक्ष्मी जी ने पूछा, “प्रभु, आप दुःखी क्यों हैं?”
विष्णु बोले, “रैदास, मेरा सबसे प्रिय भक्त, अपमानित किया जा रहा है… केवल इसलिए कि वह चर्मकार है। क्या इस संसार में मेरी भक्ति का मोल जाति से तौला जाएगा?” लक्ष्मी जी बोलीं, “प्रभु, आप ही तो कहते हैं कि सच्चे भक्त की परीक्षा होती है।”विष्णु बोले, “हां, लेकिन अब मुझे उसकी रक्षा करनी होगी… छाया बनकर।” सुबह, काशी के एक प्रसिद्ध ब्राह्मण की पुत्री बीमार पड़ गई। कई वैद्य बुलाए गए, लेकिन सब असफल। अंततः एक संत ने कहा, “यदि कोई सच्चा भक्त, निर्मल हृदय वाला व्यक्ति उस कन्या को जल पिलाए, तो वह ठीक हो सकती है।”
काशी भर के बड़े-बड़े ब्राह्मण आए, लेकिन कोई चमत्कार नहीं हुआ। जब किसी ने कहा, “संत रैदास को बुलाओ”, तो लोग हँसने लगे। “एक चमार? वो कैसे किसी को ठीक कर सकता है?” लेकिन जब लड़की की हालत और बिगड़ने लगी, तो मजबूर होकर उसके पिता ने रैदास जी को बुलवाया।रैदास जी आये। उनके हाथ में केवल एक साधारण मिट्टी का लोटा था, और होठों पर प्रभु का नाम। उन्होंने लड़की को देखते हुए कहा, “हे प्रभु, मैं तुझसे कुछ नहीं चाहता, बस इस कन्या को स्वस्थ कर दे, ताकि तेरे नाम की महिमा और बढ़े।”
उन्होंने जल उसके होठों को लगाया। और कुछ ही पल में लड़की ने आँखें खोल दीं। वह हँसी। उसके पिता रो पड़े। उसी रात, रैदास जी को स्वप्न में विष्णु जी फिर प्रकट हुए। इस बार वे मौन थे। रैदास जी ने कहा, “प्रभु, आपने मेरा साथ दिया…?”
विष्णु बोले: “मैं सदा तेरे साथ हूँ, रैदास। जब लोग तुझे धक्का देते हैं, मैं तेरे पीछे चलता हूँ। जब तू अकेला होता है, मैं तेरे मन में बैठा हूँ। और जब तू रोता है, मैं तेरे आंसुओं में बहता हूँ।” रैदास जी की आँखें भर आईं। उन्होंने झुककर कहा:“प्रभु, आप यदि मेरे साथ हैं, तो फिर मुझे किसी जाति, किसी समाज की परवाह नहीं।”
उस घटना के बाद धीरे-धीरे लोग रैदास जी को गंभीरता से लेने लगे। अब लोग उनके पास आने लगे — पीड़ित, निर्धन, दलित, और यहां तक कि ब्राह्मण भी। वे सुनते थे, और रैदास जी बोलते नहीं थे, बस भक्ति गाते थे। “प्रभु जी, तुम चंदन, हम पानी; जाको अंग-अंग बास समानी।” उनकी वाणी लोगों को छूने लगी थी। लेकिन… विरोध पूरी तरह थमा नहीं था। अगली परीक्षा, और भी बड़ी थी — जब रैदास जी को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया।
Sant Ravidas ji aur Vishnu ji Story Part 3:
कठौती में गंगा — चमत्कार और उपहास का उत्तर
काशी में धीरे-धीरे संत रैदास जी की ख्याति फैलने लगी थी। जो लोग उन्हें “चमार” कहकर तिरस्कार करते थे, वही अब उनकी वाणी सुनने आते थे। मगर समाज की ऊँच-नीच की दीवारें इतनी जल्दी नहीं टूटतीं। रैदास जी ने कभी किसी का अपमान नहीं किया, न क्रोध किया। वे बस मुस्कराते और गाते रहते: “ऐसी भगति करहु मन माहीं, जात-पात के बीच न आही।”
लेकिन पंडितों और तथाकथित धर्म के ठेकेदारों को यह बात गले नहीं उतर रही थी — कि एक चर्मकार इतना पूज्य कैसे बन गया? पंडितों की चुनौती काशी के एक बड़े मंदिर में एक सभा रखी गई — “धार्मिक मंथन”। इसमें नगर के विद्वान, ब्राह्मण और आचार्य आमंत्रित थे। किसी ने प्रस्ताव रखा: “यदि रैदास को सच में भक्ति का ज्ञान है, तो वह भी इस सभा में आमंत्रित हो।” कई ब्राह्मण आगबबूला हो गए।
“एक चमार? हमारे साथ सभा में? धर्म का अपमान होगा!” लेकिन एक वृद्ध संत ने कहा: “यदि वह भक्त है, तो उसका स्थान ईश्वर के चरणों में है — जैसे सबका।” काफ़ी बहस के बाद, अंततः रैदास जी को आमंत्रण भेजा गया — लेकिन अपमान की नीयत से। सभा के दिन रैदास जी, अपने सामान्य वस्त्रों में, कंधे पर चर्म औज़ार और हाथ में एक कठौती (चमड़ा धोने का बर्तन) लेकर पहुँचे। पंडितों ने उसे देख हँसी उड़ाई: “देखो! सभा में भी अपना गंदा कठौती लेकर आया है!” ,“इसे गंगा जल से स्नान करना चाहिए था!”
रैदास जी ने शांति से कहा: “यदि प्रभु मन में हो, तो गंगा यहीं बहती है।” सभा के बीच एक पंडित खड़ा हुआ — काशी का सबसे विद्वान और घमंडी आचार्य। उसने कहा: “यदि तू सच्चा भक्त है, तो गंगा जल इस कठौती में बहना चाहिए!” यह कहकर उसने सबके सामने रैदास जी को ललकारा।रैदास जी ने अपनी आँखें बंद कीं। स्वर धीमा, लेकिन स्पष्ट: “हे हरि, मैं तुझसे कुछ सिद्ध करने की प्रार्थना नहीं करता। लेकिन यदि मेरी भक्ति सच्ची है, तो इस कठौती को तू अपना पावन घर बना ले।”
सभा में सन्नाटा छा गया। और तभी…उस कठौती से हल्की ध्वनि आई — छल-छल… छल-छल…लोगों ने देखा — कठौती से स्वच्छ, सुगंधित जल बाहर छलकने लगा। जल इतना निर्मल था कि उसमें गंगा की सजीव छाया दिख रही थी। भीतर से एक दिव्य प्रकाश फैला। सभा की छत फट सी गई, और आकाश से उतरते हुए दिखाई दिए — स्वयं भगवान विष्णु। चारों ओर पुष्पवर्षा होने लगी। आकाशवाणी हुई: “सुनो, हे धर्म के ठेकेदारों!
यह वही भक्त है, जिसके चरणों को मैं धो सकता हूँ। जाति-धर्म से ऊपर, इसकी भक्ति मेरे हृदय को स्पर्श करती है।”सभा के सब लोग भूमि पर गिर पड़े। आचार्य काँपते हुए बोले:“हे प्रभु! हमने अपमान किया… हम क्षमाप्रार्थी हैं।”
विष्णु बोले: “क्षमा रैदास से मांगो — वही मेरा सच्चा दूत है।” रैदास जी ने सभी को उठाया।“मुझे कोई क्षमा नहीं चाहिए।यदि मेरी कठौती में गंगा आ गई,तो वह केवल मेरे मन की सफाई का परिणाम है,चमड़े के बर्तन की नहीं।”सभा में उपस्थित हर व्यक्ति के आँसू बह निकले।वह दिन काशी के इतिहास में अमर हो गया।अब लोग उन्हें “संत रैदास” कहने लगे। उन्होंने न मंदिर माँगा, न गद्दी। वे अपने झोंपड़ी में ही रहे, और वही से भक्ति का प्रवाह बहता रहा।पंडितों ने उन्हें सम्मानपूर्वक आमंत्रित किया, और वे जहाँ भी जाते, वहां केवल यही गाते:“मन चंगा तो कठौती में गंगा।हरि बिना मैं नाही रे संग।”
Sant Ravidas ji aur Vishnu ji Story Part 4:
विष्णु दर्शन और आत्मबोध
कठौती में गंगा प्रकट होने की घटना के बाद काशी ही नहीं, आसपास के सभी राज्यों में संत रैदास जी की ख्याति फैल गई। लोग उन्हें अवतारी पुरुष मानने लगे। लेकिन रैदास जी ने कभी भी स्वयं को महान नहीं बताया — वे बस भगवान के दास थे।
परंतु अब समय आ गया था कि ईश्वर स्वयं अपने भक्त को उसकी आत्मा की गहराई का बोध कराएं। एक रात्रि थी — अत्यंत शांत, तारों से भरी। रैदास जी अपनी झोंपड़ी के बाहर बैठे थे, प्रभु का भजन कर रहे थे: “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाको अंग-अंग बास समानी…”जैसे ही उन्होंने भजन समाप्त किया, अचानक आकाश में तेज़ प्रकाश फैला। वह कोई साधारण रोशनी नहीं थी — वह ब्रह्म तेज था। आकाश खुला और उस प्रकाश में प्रकट हुए — भगवान विष्णु, कमल पर आसीन।
भगवान विष्णु बोले: “रैदास, अब समय आ गया है कि तू अपने वास्तविक स्वरूप को जाने। तू केवल इस जन्म का नहीं है। चल, मेरे साथ।”क्षण भर में रैदास जी का शरीर तेजोमय हो गया। उन्होंने आँखें बंद कीं, और अगले पल वे स्वयं को ब्रह्मांड की सीमाओं से परे, ब्रह्मलोक में अनुभव कर रहे थे।वहां दिव्य संगीत था, शांत जल, स्वर्णिम मंदिर और देवी-देवता। हर दिशा से पुकार आ रही थी:“जय रैदास! विष्णुभक्त रैदास!!”
विष्णु जी ने उन्हें एक दिव्य जल में झाँकने को कहा। जल में छवि बनी — एक ऋषि, जो वन में तपस्या कर रहे थे। उसके आस-पास देवता भी नतमस्तक थे। रैदास जी ने पूछा, “यह कौन है, प्रभु?” विष्णु बोले:“यह तू ही है, रैदास। पूर्वजन्म में तू एक महान तपस्वी था। तूने ब्रह्मलोक में भी अपना स्थान त्याग दिया था यह कहकर — ‘जब तक पृथ्वी पर भेदभाव है, तब तक मैं स्वर्ग का सुख नहीं चाहता।’”
“तेरे ही संकल्प से तू आज मानव रूप में जन्मा है — ताकि समाज को प्रेम, समानता और भक्ति का मार्ग दिखा सके।”रैदास जी की आँखों में आँसू थे।“प्रभु, मैंने तो केवल आपको चाहा था। पर आपने तो मुझे सब कुछ दे दिया…” विष्णु जी ने तब उन्हें अपना विराट रूप दिखाया — जिसमें ब्रह्मा, शिव, सूर्य, चंद्र, सभी समाहित थे। उनके स्वर गूंजे: “जो रैदास को जाने मेरा, वह भवसागर से उतरे तेरा।”
रैदास जी ने नतमस्तक होकर कहा: “प्रभु, मैं जात-पात को मिटाना चाहता हूँ। मैं वह भक्ति देना चाहता हूँ जिसमें मंदिर की ज़रूरत न हो — केवल मन की शुद्धता हो।” भगवान बोले: “तू यही कार्य करने आया है। और मैं सदा तेरे साथ हूँ। तू अब केवल भक्त नहीं, मेरा सखा है।” जब रैदास जी ने आँखें खोलीं, वे फिर अपनी झोंपड़ी में थे — परंतु सब कुछ बदल गया था।
उनके हाथों में कमल का पुष्प था, जो उन्होंने ब्रह्मलोक में देखा था। यह कोई स्वप्न नहीं था — यह आत्मबोध था। इसके बाद, रैदास जी की वाणी और भी शक्तिशाली हो गई। लोग उनकी बातों से अपने हृदय की गाँठें खोलने लगे।
वह गाते “जात-पात के फेर में उलझे सब संसार, रैदास कहे, भजे जो हरि को, सो ही ब्रह्म के द्वार।” अब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — सब उनके चरणों में बैठते।
विष्णु जी ने उन्हें आदेश दिया था: “अब तू जाकर उत्तर और दक्षिण भारत में मेरा संदेश फैला। जहां-जहां भेद है, वहां तू ब्रह्म की एकता की मशाल ले जा।” रैदास जी यात्रा पर निकले — लेकिन गद्दी, चेलों या संपत्ति के बिना। उनके पास केवल प्रभु का नाम था और करुणा से भरा हृदय।
Sant Ravidas ji aur Vishnu ji Story Part 5:
सच्चा ब्राह्मण — भक्ति का संदेश और अमर विरासत
एक दिन, दूर राजस्थान की धरती से एक युवती काशी पहुँची। सिर पर सफेद वस्त्र, आँखों में भक्ति, होठों पर एक ही नाम — “रघुवीरा”, “हरि”, “रैदास जी मेरे गुरु!” वह कोई साधारण स्त्री नहीं थी — वह थीं मीराबाई, चित्तौड़ की राजकुमारी, जिन्होंने सांसारिक वैभव छोड़ दिया था, क्योंकि उन्हें केवल ईश्वर चाहिए था।
उन्होंने सुना था — “काशी में एक चर्मकार है, जो साक्षात हरि की भक्ति है।” जब उन्होंने रैदास जी के चरणों में सिर रखा, तब सभा में बैठे लोग अचंभित रह गए “राजकुमारी और एक चमार के शिष्य?” मीराबाई बोलीं “रैदास जी चमार नहीं, ब्रह्मज्ञानी हैं। उनके चरणों में ही हरि है। मेरा राजमहल उनका झोंपड़ा है।”
एक दिन एक घमंडी ब्राह्मण सभा में आया और बोला “यदि मीराबाई को शिक्षा देनी है, तो कोई ब्राह्मण चाहिए, चमार नहीं।” रैदास जी शांत रहे। उन्होंने एक छोटा पात्र मँगवाया और दोनों से कहा: “इस पात्र में दूध डालो।” ब्राह्मण ने गाय का दूध डाला, और रैदास जी ने अपने पास रखा दूध डाला।
फिर बोले “अब बताओ, किसका दूध श्रेष्ठ है?” सभा मौन थी। रैदास जी बोले “जिस प्रकार दूध की जात नहीं होती, उसी प्रकार भक्ति की भी नहीं होती। जो ज्ञान से, प्रेम से, सेवा से भरा हो — वही सच्चा ब्राह्मण है।” रैदास जी ने अब जीवन के अंतिम चरण में प्रवेश किया था। उनका शरीर वृद्ध हो रहा था, पर आत्मा और अधिक प्रकाशमान।
हज़ारों शिष्य उनके पास आए — किसान, स्त्री, राजा, दलित, व्यापारी। वे एक ही बात कहते: “गुरुदेव, आपने हमें हरि से जोड़ा, आपने हमें हमारा आत्मा रूप दिखाया।” रैदास जी गाते: “मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा। भीतर का मैल धोना ज़रूरी है।”
एक दिन, उन्होंने घोषणा की: “मैं अब यात्रा पर निकलूंगा — अनंत की ओर। लेकिन मेरा शरीर नहीं, मेरा वचन अमर रहेगा।” जैसे ही रैदास जी गंगा किनारे बैठे ध्यान में लीन हुए, आकाश फिर से प्रकाशमान हुआ।
भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए — इस बार और भी विराट रूप में। उनके साथ ब्रह्मा, शिव, सरस्वती, लक्ष्मी, नारद और अनंत देवगण उपस्थित थे।विष्णु बोले “रैदास, तूने पृथ्वी पर मेरा कार्य पूर्ण किया। तूने मेरे नाम को नीच-ऊँच की दीवारों से परे रखा। अब मैं तुझे अमरत्व का वरदान देता हूँ।”
वहां उपस्थित हर भक्त ने देखा — रैदास जी का शरीर तेज में विलीन हो गया। उनकी काया नहीं जली, न मिटी — वह प्रभु में समा गई। आज भी रैदासी समाज, मीराबाई की वाणी, गुरु ग्रंथ साहिब के पद, और भारत की संत परंपरा — रैदास जी की अमर आत्मा को जीवित रखती है।
उनके कुछ पद “अब मेरो कछु न रह्यो, सब तुझहि को दास। जो कछु किया सो तुझ किया, मैं नहीं किया कछु नाश।” “प्रभु जी, तुम चंदन, हम पानी, जाको अंग-अंग बास समानी।”
संत रैदास जी की कथा केवल इतिहास नहीं, वह आज का मार्गदर्शन है। भक्ति जन्म नहीं देखती, हृदय देखती है। मंदिर और मूर्तियों से पहले, ईश्वर हमारे मन में बसे हैं। भगवान विष्णु ने स्वयं यह सिद्ध किया — कि उनका प्रिय भक्त वह है जो प्रेम से, सेवा से, और सत्य से भरा हो।
काशी की गलियों से लेकर ब्रह्मलोक तक फैली यह यात्रा — एक साधारण चर्मकार की नहीं, एक असाधारण आत्मा की थी। जो भगवान विष्णु की छाया में जन्मी, और उन्हीं में विलीन हो गई।
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धन्यवाद, जय हिंद

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