भगवान श्री कृष्ण और संत रविदास जी

भगवान श्री कृष्ण और संत रविदास जी – अखंड कथा
वाराणसी की पावन नगर भगवान श्री कृष्ण और संत रविदास जी – अखंड कथा।
गंगा किनारे बसे घाट… मंदिरों में बजते घंटे, और गलियों में गूंजते भजन। इन्हीं गलियों में, एक साधारण सा घर था, जहां एक मोची का बेटा जन्मा — उसका नाम था रविदास।
जन्म से ही उसका मन भक्ति में रमा रहता। जूते बनाने का काम करते हुए भी उसका मन भगवान के ध्यान में डूबा रहता। लोग कहते “रविदास, तू जन्म से चमार है, भक्ति तेरे बस की नहीं।”वो मुस्कराकर जवाब देता — “भक्ति का कोई जाति, रंग या रूप नहीं… भक्ति तो आत्मा का आभूषण है।
एक रात, जब रविदास गंगा किनारे ध्यान कर रहा था, एक दिव्य प्रकाश उसके सामने प्रकट हुआ। वो कोई साधारण ज्योति नहीं थी — वो स्वयं भगवान विष्णु का तेज था। उस प्रकाश से एक मधुर स्वर आया —
“रविदास… तेरी भक्ति ने त्रिकाल को छू लिया है। जल्द ही तू मुझसे मिलेगा।” रविदास ने आंखें खोलीं, चारों ओर शांति थी, पर उसके हृदय में एक गूंज बनी रही — “मुझसे मिलेगा”… इसका अर्थ क्या है?
दिन बीते… एक सुबह, बनारस के घाटों पर एक नील वस्त्रधारी, पीताम्बर पहने, मुरली धारी युवक आया। उसके चेहरे पर अद्भुत आभा थी, और आंखों में अनंत प्रेम।
वो धीरे-धीरे रविदास की दुकान तक पहुंचा और बोला —“भाई, क्या मेरे लिए एक जोड़ी जूते बना सकते हो?” रविदास ने बिना ऊपर देखे कहा — “जूते तो बना दूंगा, पर पहले बैठो, थक गए होगे।”
जब उसने ऊपर देखा, तो उसकी सांस रुक गई — वो चेहरा वही था, जो उसने ध्यान में देखा था… वही, जिसे उसके हृदय ने सदियों से पूजा था। रविदास के हाथ कांपने लगे — “प्रभु… आप? मेरे घर, मेरी दुकान?”
कृष्ण मुस्कुराए — “रविदास, तेरी भक्ति ने मुझे खींच लिया। मैं द्वारका से चलकर तेरे पास आया हूं। मैं तेरा ग्राहक नहीं, तेरा मित्र हूं। रविदास ने कहा —“मित्र तो संसार में बहुत होते हैं, पर जो आत्मा के मित्र बन जाएं, वही सच्चे होते हैं।”
कृष्ण बोले — “आज मैं तेरे संग बैठूंगा, तेरा काम करूंगा, और देखूंगा कि सेवा में आनंद कैसे मिलता है।” कृष्ण ने जूते बनाने में उसकी मदद की। दोनों ने साथ में चमड़ा काटा, सुई पिरोई और जूते सिले। रविदास ने पूछा —“प्रभु, क्या आपको ये काम कठिन नहीं लगता?”
कृष्ण ने उत्तर दिया — “कोई भी काम कठिन नहीं होता, अगर उसमें प्रेम हो। जैसे तू हर जूते को भक्ति मानकर बनाता है, वैसे ही मैं हर प्राणी को अपना मानकर प्रेम करता हूं।” कुछ दिन बाद, बनारस में एक पंडित ने रविदास को चुनौती दी —
“तुम कहते हो कि भगवान तुम्हारे मित्र हैं, सिद्ध करो।” रविदास ने मुस्कराकर कहा —“भक्ति प्रमाण मांगती नहीं, अनुभव देती है।”उसी समय कृष्ण वहां प्रकट हो गए, और बोले —“जो रविदास को अपमानित करता है, वह मुझे अपमानित करता है।”
पंडित के चरण स्वयं ही रविदास के चरणों में लग गए।कृष्ण ने कहा —“रविदास, अब मुझे जाना होगा, पर याद रखना — जब भी तू मेरा नाम प्रेम से लेगा, मैं तेरे पास रहूंगा, चाहे रूप में दिखूं या न दिखूं।”
रविदास की आंखों में आंसू थे — “प्रभु, मैं आपको जाने नहीं दूंगा।” कृष्ण ने मुरली बजाई… एक मधुर राग गूंज उठा, और वह प्रकाश बनकर अंतर्ध्यान हो गए।
उस दिन से, रविदास ने हर कार्य को भगवान की सेवा मानकर करना शुरू किया। उसके जूतों में सिर्फ चमड़ा नहीं, प्रेम और आशीर्वाद भी सिला होता। और कहते हैं, जो भी रविदास के बनाए जूते पहनता, उसके जीवन से दुख दूर हो जाता।
क्योंकि उन जूतों में कृष्ण की मित्रता और रविदास की भक्ति की शक्ति होती , गंगा के तट पर बैठकर जब श्रीकृष्ण और संत रविदास जी ने पहला संवाद पूरा किया, तो आसमान में हल्की-हल्की बारिश की बूंद गिरने लगीं।
हवा में एक अद्भुत सुगंध घुल गई—मानो तुलसी और कुमुदनी का संगम हो। रविदास जी ने अपने भीगे हुए वस्त्रों की परवाह न करते हुए, अपनी गहरी आँखों से कृष्ण की ओर देखा। कृष्ण मुस्कुरा रहे थे, जैसे सब कुछ पहले से जानते हों।
कृष्ण बोले— “रविदास, तूने प्रेम को साध लिया है, लेकिन प्रेम को संसार में जीना ही सबसे कठिन है। लोग तुझे जाति, काम और रूप से तौलेगे। पर तेरा मन हर क्षण मेरे चरणों में हो, तो कोई तुझे छू भी नहीं सकता।”
रविदास जी ने धीमे स्वर में कहा— “प्रभु, प्रेम तो सहज है, कठिन तो मनुष्यों के बनाए बंधन हैं।” कृष्ण ने अपने करुणामय नेत्रों से उन्हें देखा और अपनी बांसुरी उठाई। एक मधुर राग छेड़ते ही गंगा की लहरें थिरक उठीं।
रविदास जी को लगा, मानो हर लहर कह रही हो— “बंधन तो केवल मन में है, सत्य में नहीं।” कुछ ही दिनों बाद गाँव में एक बड़ा मेला लगा। दूर-दूर से साधु, पंडित, व्यापारी और सामान्य लोग आए।
कई पंडितों ने रविदास जी को घेर लिया और कहने लगे—”तुम चमार हो, तुम्हें भक्ति का क्या अधिकार? भगवान तुम्हारे पास आएंगे? कभी नहीं!” भीड़ में कानाफूसी होने लगी। लेकिन उसी क्षण, एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। प्रकाश के बीच खड़े थे श्रीकृष्ण, अपनी नीली आभा और मोरपंख मुकुट के साथ।
कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा— “जो मुझे प्रेम करता है, मैं उसी का हूँ। न जन्म पूछता हूँ, न रूप, न कर्म।” भीड़ स्तब्ध रह गई। सभी पंडित चुप हो गए और धीरे-धीरे वहा से हट गए।
उस दिन के बाद, संत रविदास जी का नाम गांव गांव गूंजने लगा। लोग अब उन्हें केवल चमार नहीं कहते थे—वे भक्त रविदास बन चुके थे। लेकिन रविदास जी के लिए यह किसी मान-सम्मान का विषय नहीं था।
वे अब भी गंगा किनारे अपनी छोटी सी कुटिया में चमड़े का काम करते, भजन गाते और आने वालों को प्रेम का संदेश देते।
कृष्ण अक्सर अदृश्य रूप में उनके पास आते, कभी बांसुरी की धुन से, कभी गंगा की लहरों में, कभी एक छोटे बालक के रूप में जो आकर कहता—
“रविदास, आज कोई भूखा न सोए।”
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धन्यवाद, जय हिंद
