संत रविदास जी के शिष्य | Sant Ravidas ji
संत रविदास जी के शिष्य | Sant Ravidas ji

यूं तो हम सभी संत शिरोमणि रविदास जी महाराज (Sant Ravidas Ji)
के बारे जानते है कि वो कितने कार्य कुशल प्रेमी थे , परंतु कार्य के साथ साथ उनको भक्ति करना,लोगों का मार्गदर्शन भी करते रहते थे,उन में कुछ शिष्य जो जात पात की सारी बाधाओं को तोड़कर उनके शिष्य बने और मार्गदर्शन लिया ,यह कहानियां देख रहे हैं, आपके चैनल स्टोरीज बाय गुलाब गौतम पर और सदैव्य अच्छी कहानियों को शेयर करना चाहिए और हमेशा एक साथ बनाए रखें,और आगे बढ़ते रहे है और जानें उनके शिष्यों के बारे में।
संत रविदास जी का जीवन केवल एक संत का नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति और आध्यात्मिक प्रकाश की अद्वितीय मिसाल है। उन्होंने न केवल भक्ति और प्रेम का संदेश दिया, बल्कि जात-पात, छुआछूत और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज़ भी बुलंद की। उनका जीवन दर्शन आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है, जब इंसान फिर से प्रेम, सहिष्णुता और समानता के मूल्यों की ओर लौटना चाहता है। इस विस्तृत जीवनी में हम उनके जीवन के हर पहलू को गहराई से जानने का प्रयास करेंगे।
संत रविदास जी के प्रमुख शिष्य और उनकी जीवन गाथाएं।
संत रविदास जी का जीवन केवल उनका नहीं था, वो अपने शिष्यों के जीवन का भी आधार बन गया। उन्होंने अपने विचारों और कर्मों से समाज को झकझोर दिया और अनेकों को प्रेरित किया। ये शिष्य भी उसी आलोक में तपे, सीखे और आगे बढ़े। इस अध्याय में हम न सिर्फ उनके शिष्यों की जीवन यात्रा पर दृष्टि डालते हैं, बल्कि उनके और गुरु रविदास जी के आत्मिक संबंधों को भी समझने की कोशिश करते हैं।
1. संत मीरा बाई:
राजस्थान की मेड़ता रियासत की राजकुमारी मीरा बाई को संत रविदास जी का सबसे प्रसिद्ध और समर्पित शिष्य माना जाता है। बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन मीरा बाई सांसारिक बंधनों से परे होकर ईश्वर की ओर खिंचती चली गईं। जब वे समाज की रूढ़ियों से जूझ रही थीं, तब संत रविदास जी उनके मार्गदर्शक बनकर सामने आए।
रविदास जी से मिलने के बाद मीरा बाई का जीवन ही बदल गया। उन्होंने कहा:
“गुरु मिले रैदास जी, पूरण परमात्मा”
मीरा बाई ने अपने गुरुदेव से यह सीखा कि ईश्वर की सच्ची भक्ति में कोई भेद नहीं होता — न स्त्री-पुरुष का, न जात-पात का, न धनी-निर्धन का। वे अपने गुरुदेव के चरणों में बार-बार प्रार्थना करती थीं, और उनके भजनों में रविदास जी का नाम प्रेम से लिया करती थीं। दोनों के संबंध गुरु-शिष्य से कहीं अधिक आत्मिक और आध्यात्मिक थे। मीरा का जीवन भक्ति, त्याग और प्रेम की जीती-जागती मिसाल बना, और इस मार्ग में संत रविदास जी की भूमिका निर्णायक रही।
2. जगन्नाथदास जी:
जगन्नाथदास जी पहले एक विद्वान ब्राह्मण हुआ करते थे। वे वेद-पुराण पढ़ते थे लेकिन उन्हें संतोष नहीं था। एक बार संत रविदास जी के प्रवचन सुनने के बाद उनके मन में आत्मज्ञान की भूख जागी। वे वाराणसी आए और रविदास जी के चरणों में दीक्षा ली।
रविदास जी ने उन्हें बताया कि ज्ञान का असली अर्थ है – सेवा और समर्पण। उसके बाद जगन्नाथदास जी ने सब कुछ त्यागकर संत जीवन अपना लिया। वे भारतवर्ष में घूम-घूमकर गुरु रविदास के विचारों को फैलाने लगे। उनके प्रवचन में लोगों को वही सरलता, वही प्रेम और वही करुणा मिलती थी जो रविदास जी की वाणी में थी।
3. संत धन्ना भगत:
धन्ना भगत सीधे रविदास जी के संपर्क में भले न रहे हों, लेकिन उनकी शिक्षाओं से गहराई से जुड़े रहे। वे एक किसान परिवार से थे और समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कर्मकांडों से ऊब चुके थे। उन्होंने सरल भक्ति का मार्ग चुना।
रविदास जी की शिक्षाओं से प्रेरित होकर उन्होंने जात-पात के भेद को त्यागा और आत्मिक साधना को अपनाया। उनकी रचनाओं में संत रविदास जी के प्रभाव स्पष्ट झलकते हैं:
“भगत न होई साधन करिए, भगति होई गुरू की कृपा से।”
धन्ना भगत ने अपने जीवन से यह दिखाया कि अगर नीयत सच्ची हो तो खेत में हल चलाते हुए भी प्रभु को पाया जा सकता है।
4. पीपा जी (राजा पीपा):
राजा पीपा पहले एक समृद्ध राज्य के शासक थे। लेकिन भीतर से वे खाली महसूस करते थे। जब उन्होंने रविदास जी के विचार सुने कि “ईश्वर मंदिर में नहीं, मन में है,” तो वे स्वयं वाराणसी आए और रविदास जी से दीक्षा ली।
उन्होंने अपनी राजगद्दी छोड़ दी, राजसी वस्त्र त्याग दिए और एक साधु का जीवन अपना लिया। वे अक्सर कहते थे:
“जो खोजे मन में प्रभु को, सो पावे निज स्वरूप।”
राजा पीपा ने समाज में समता और धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार किया और संत रविदास जी को अपने जीवन का प्रेरणा स्त्रोत बताया। उनके जीवन में गुरु के प्रति गहन श्रद्धा और अपने अहम का पूर्ण समर्पण दिखाई देता है।
5. संत सेन जी:
संत सेन पेशे से नाई थे, लेकिन आत्मा से एक सच्चे साधक। उन्हें समाज ने कभी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा, लेकिन संत रविदास जी ने उन्हें गले लगाया और बताया कि भक्ति सबके लिए है।
सेन जी रविदास जी के साथ अनेक बार भजन-कीर्तन में भाग लेते थे। वे कहते थे:
“सेवा करै संत की, सोई सच्चा योग।”
उन्होंने अपने जीवन में सेवा, सरलता और समर्पण को ही भक्ति का आधार माना। उनके शिष्य भी आगे चलकर समाज सुधारक बने।
गुरु-शिष्य संबंध की विशेषताएँ:
संत रविदास जी और उनके शिष्यों का संबंध केवल उपदेश और अनुसरण का नहीं था – यह आत्मा की गहराई में बसी हुई समझदारी और प्रेम का था। वे अपने शिष्यों के भीतर छिपे ईश्वर को पहचानते थे और उन्हें उसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते थे।
इन शिष्यों ने गुरु रविदास जी के विचारों को जन-जन तक पहुँचाया। वे अलग-अलग जातियों, वर्गों और क्षेत्रों से थे, लेकिन एक ही धागे में पिरोए गए – भक्ति, प्रेम और समानता के धागे में।
इनकी जीवन गाथाओं से यह सिद्ध होता है कि संत रविदास जी केवल एक संत नहीं थे, बल्कि एक युग पुरुष थे, जिन्होंने अपनी चेतना से न जा
ने कितनों के जीवन का मार्ग बदल दिया।
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