Sant Ravidas Ji aur Macchi Wale Ki Kahani
Sant Ravidas Ji aur Macchi Wale Ki Kahani

भारत में बहुत सारे संतो के बारे जानने को मिलता है ,लेकिन भारत की भक्ति परंपरा में Sant Ravidas Ji का नाम बड़े ही आदर सम्मान से लिया जाता है ,उन्हें करुणा, समानता और सच्चे कर्म का प्रतीक मानते है।
उन्होंने हमें सिखाया कि ईश्वर मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि सच्चे हृदय और नेक कर्मों में वास करते हैं। यह कहानी है एक साधारण मछली बेचने वाले आशीष मल्हार की है , अशीष मल्हार की ज़िंदगी कैसे बदली संत रविदास जी की वाणी और मार्गदर्शन से ।
एक साधारण Macchi Wala

गंगा किनारे बसे एक छोटे से गांव में अशीष मल्हार नाम का एक macchi wala रहता था। रोज़ सुबह वह नदी से मछली पकड़ता और बाज़ार में बेचकर अपने परिवार का पालन पोषण करता था। उसका जीवन कठिन था, पर मन में लालच कभी नहीं आया।
लेकिन गांव में कुछ लोग उसे नीची नज़र से देखते थे, बहुत भला बुरा कहते थे , क्योंकि उसका काम “अशुद्ध” माना जाता था। आशीष मल्हार यह सब चुपचाप सह लेता, पर भीतर ही भीतर उसका मन टूटता जा रहा था, लेकिन उसे एक उम्मीद थी कही न कही जीवन में सब सही होगा ।
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फिर मुलाकात होती है ,Sant Ravidas Ji से

एक दिन गांव में Sant Ravidas Ji का आगमन होता है। लोग उनके सत्संग के लिए दूर-दूर से आए हुए थे । आशीष मल्हार भीड़ में खड़ा खड़ा सुन रहा था। संत रविदास जी ने सत्संग शुरू किया और जैसे ही कहा – “मन चंगा तो कठौती में गंगा ”
यह वाक्य अशीष मल्हार के दिल में उतर गया। उसे लगा मानो कोई उसके मन की पीड़ा को समझ रहा है ,उसे अच्छा लग रहा था,हल्का महसूस हो रहा था । उसे लगा जीवन अब सार्थक हो सकता ।
Macchi Wale की दुविधा
सुबह सुबह चहचहाहट चिड़ियों के साथ खुशी खुशी उठता है , बाकी दिनचर्या के काम निपटा कर वह ,जब उस दिन मछली पकड़ने गया। उसका मन ही नहीं लग रहा था ,उसके मन में बहुत सवाल उठ रहा थे।
“क्या मेरा काम पाप है? क्या मैं कभी ईश्वर के क़रीब नहीं जा सकता हु ?” उसी दिन उसने तय किया कि वह महाराज संत रविदास जी से मिलकर अपनी शंका को दूर करने की कोशिश करेगा ।
संत और मछली बेचने वाले की मुलाक़ात
जब आशीष मल्हार,झिझकते हुए Sant Ravidas Ji के पास पहुंचा और बोला, “महाराज, मैं आशीष मल्हार मछली बेचता हूं । लोग मेरे कार्य और मुझे नीचा समझते हैं। क्या महाराज आपके ईश्वर मुझे स्वीकार करेंगे?” Sant Ravidas Ji ने मुस्कराकर कहा, “बेटा, ईश्वर हमेशा कर्म और भाव को देखते हैं।
अगर तुम्हारा मन करुणा से भरा है और तुम ईमानदारी से जीवन जीते हो, तो, तुम अपने आप को कभी कम मत समझो।”
करुणा की परीक्षा

संत रविदास जी ने आशीष मल्हार की करुणा की परीक्षा लेने के लिए,आशीष मल्हार से कहा, “आज जो पहली मछली तुम्हारे जाल में फंसे, उसे नदी में वापस छोड़ देना।” अशीष मल्हार ने ऐसा ही किया। जैसे ही पहली मछली छोड़ी,और छोड़ते समय उसके दिल में अजीब-सी शांति थी, भाव बदल से गए। और आशीष मल्हार उनके इस कसौटी पर खरा उतरा।
उस दिन उसने कम मछलियां पकड़ी , मगर आशीष मल्हार का मन बहुत हल्का महसूस कर रहा था। क्यों ये अनुभव उसके लिए एकदम नया था।
जीवन में बदलाव
कुछ समय बीतने के बाद धीरे-धीरे आशीष मल्हार ने अपनी आदत बदल डाली । वह ज़रूरत से ज़्यादा मछली कभी नहीं पकड़ता, गरीबों को मुफ्त मछली भी कभी कभी दे देता और हर दिन कुछ समय भक्ति में लगाने लगा।
लोगों ने देखा कि macchi wala अब पहले जैसा नहीं रहा, जैसे लोग उसे पहले देखते थे । क्योंकि उसके व्यवहार में विनम्रता और चेहरे पर मुस्कान रहती थी। जो लोग पहले उसे तुच्छ समझते थे, वही अब उसका सम्मान करने लगे ,और अच्छे से बात करते थे।
गांव वालों की समझ

कुछ समय और बिता एक दिन गांव में अकाल जैसी स्थिति बन गई। आशीष मल्हार ने अपने पास बची सारी मछली बिना दाम के बांट दीं।
तब गांव वालों को समझ आया कि बड़ा इंसान वही होता है, जिसके मन में दया और सेवा हो,यह सब करते हुए, आशीष मल्हार को वही दिन याद आया जो संत रविदास जी ने बताया था ,जब उसे लोग अभ्यस्त समझते थे। उसकी आंखों में अश्रु थे ,लेकिन लोग अब उससे मिल जुल कर रहने लगे। पूरे उस अकाल की परिस्थिति में सभी एकत्र होकर एक दूसरे का सहारा बने। जिसमें सबसे पहल आशीष मल्हार ने की थी।
आगे चलकर गांव में फिर एक बार सत्संग लगा ,उस सत्संग में आशीष मल्हार ने सारी व्यथा बताई , रैदास जी को कैसे उसका जीवन बदल गया ,उस सत्संग में Sant Ravidas Ji ने कहा, “समाज को बदलने के लिए बड़े उपदेश नहीं, सच्चा आचरण चाहिए जो एक दूसरे से हो मिल सकते है।”
नैतिक शिक्षा (Moral)
किसी ने सही कहा है ,कर्म छोटा या बड़ा नहीं होता, भाव बड़ा होना चाहिए। ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता सच्चाई, करुणा और सेवा से होकर ही गुजरता है। किसी के पेशे से नहीं, उसके मन और कर्म से इंसान की पहचान होती है, जैसे इस कहानी में आशीष मल्हार के साथ हुआ।
यह कहानी हमें सिखाती है कि Sant Ravidas Ji की भक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला में है।
एक साधारण macchi wala भी, अगर सच्चे मन से चाहे और सच्चे कर्म करे, तो वही सबसे बड़ा भक्त बन सकता है।
“जहां प्रेम है, वहीं प्रभु हैं।”
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धन्यवाद, जय हिंद
