Buddha vs Bhagwan- बुद्ध की कहानी
Buddha vs Bhagwan- बुद्ध की कहानी
यह कहानी है बुद्ध और एक बालक की जो ये दर्शाती है,जीवन मार्ग सरल नहीं है ,तो क्या हुआ हमे उसे सरल बनाने की कोशिश करनी चाहिए न कि भगवान भरोसे रहना चाहिए।

Buddha vs Bhagwan-बुद्ध ने क्यों कहा भगवान की पूजा करना सही नहीं है ?
एक समय पहले की बात है, भारत की पवित्र भूमि पर एक शांत वन हुआ करता था। जहां बुद्ध अपने शिष्यों के साथ रहते थे, सुबह की ठंडी हवाएं पेड़ों की पत्तियों से सर सराती हुई निकल रही थी, सूर्य की किरणें धीरे धीरे धरती पर उतर रही थी और आश्रम में गुजरती हुई ,चिड़ियों की आवाज़ एक मधुर संगीत से कम नहीं थे।
उसी समय एक दूर गांव से एक युवक आश्रम में आया उनका नाम था, नाथ उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें थी और आंखों में बहुत सारे सवाल बुद्ध के पास आया, उनके चरणों में झुका और बोला प्रभु क्या आप मेरे प्रश्नों का उत्तर दे सकेंगे ।
बुद्ध मुस्कुराए वह जानते थे कि हर प्रश्न किसी खोज की शुरुआत होती है बुद्ध ने शांत स्वर में कहा पूछो , नाथ ने कहा मैं बचपन से सुनता आया हूं कि भगवान ही सब कुछ करते हैं वह सृष्टि के रचयिता हैं ,हमें दुख सुख सब कुछ देते हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष भी उन्हीं से मिलता है, मेरे जीवन में इतने कष्ट आए हैं।
मैने बहुत प्रार्थना है की व्रत रखे मंदिरों के चक्कर लगाए फिर भी दुख कम नहीं हुआ, क्या भगवान सच में होते हैं अगर हैं तो क्या वह मेरी मदद नहीं करना चाहते और अगर नहीं होते तो हम उनकी पूजा क्यों, करें यह सुनकर बुद्ध कुछ क्षण मौन रहे और आसपास के भिक्षु भी शांत हो गए।
जो जानते थे ,जब बुद्ध चुप होते हैं ,तो कोई गहरा उत्तर आने वाला होता है बुद्ध ने नाथ की ओर देखा और पूछा तुम्हारा मन कैसा है , नाथ ने कहा प्रभु जैसी किसी ने भीतर आग लगा दी हो, बुद्ध मुस्कुराए उनके पास खड़े एक वरिष्ठ भिक्षु आनंद से कहा, नाथ को नदी तक ले जाओ पात्र में जल भर कर लाओ,लेकिन जब तक जल पूरी तरह स्वच्छ ना हो तब तक वापस मत लौटना,नाथ को आश्चर्य हुआ लेकिन वह चुपचाप आनंद के साथ चल पड़ा।
दोनों नदी के किनारे पहुंचे नदी की धार तेज थी और नीचे कीचड़ था आनंद ने जल भरने का प्रयास किया लेकिन पानी बहुत गंदा था, उन्होंने जल पात्र नीचे रखा और कहा यह जल पीने योग्य नहीं है, हमें इंतजार करना होगा नाथ अधीर हो गया, उसने पूछा क्या हम किसी दूसरी से नदी से जल नहीं ले सकते आनंद मुस्कुराए और बोले बुद्ध ने यही नदी बताई है ,हमें धैर्य रखना होगा।
दोनों किनारे पर बैठ गए धीरे-धीरे कीचड़ नीचे बैठने लगा बहाव कम हो गया कुछ समय बाद जल एकदम स्वच्छ प्रतीत हुआ आनंद ने जल पात्र में जल भरा और दोनों लौट चले, जब वे आश्रम पहुंचे बुद्ध ने उनसे पूछा क्या? जल साफ हो गया, नाथ ने सर हिलाया हां प्रभु ने फिर पूछा क्या जल को किसी ने साफ किया,नाथ ने बोला नहीं प्रभु हम बस बैठे रहें और जल्द स्वयं शांत हो गया बुद्ध ने मुस्कुरा कर कहा यही जीवन का सत्य है।
जब मन अशांत होता है, विचार गंदे और भ्रमित होते हैं, तब तुम भगवान की प्रार्थना करते हो लेकिन तुम्हारा मन उस गंदे जल की तरह होता है जो देखने और समझने योग्य बिल्कुल नहीं होता भगवान की पूजा करना तब तक व्यर्थ है ,जब तक तुम अपने भीतर की गंदगी ,क्रोध , लोभ,मोह माया को शांत नहीं कर लेते हो, नाथ ध्यान से सुन रहा था।
नाथ ने पूछा ? लेकिन प्रभु मंदिरों में तो लोग कहते हैं, भगवान ही सब कुछ है क्या सब झूठ बोलते हैं, बुद्ध ने उत्तर दिया झूठ और सच का निर्णय तब तक ना करो जब तक तुम स्वयं अनुभव न करो लोग चमत्कारों में विश्वास करते हैं पर मैं अनुभव और करुणा में करता हूं ,विश्वास दुख का कारण है , कोई ईश्वर नहीं हमारी तृष्णा है, सुख का कारण कोई वरदान नहीं हमारा आचरण है।
बुद्ध ने आगे समझाया हर एक व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगता है, अगर तुम तुम बीज कांटों का डालोगे तो कांटे ही उगेंगे और फूल का डालोगे तो फूल उगेंगे, यही प्रकृति का नियम है और इसी को धर्म कहा जाता है क्या धर्म ईश्वर से अलग है नाथ ने फिर से पूछा? बुद्ध ने उत्तर दिया धर्म वह सत्य है, जो समय और स्थान से परे है,जैसे अग्नि में जलन की शक्ति होती है, वैसे ही धर्म में जीवन को दिशा दिखाने की शक्ति होती है, भगवान का विचार एक सहारा हो सकता है लेकिन जब तुम स्वयं चलना सीखते हो तभी मंजिल मिलती है। नाथ अब शांत हो चुका था।
उसके भीतर का तूफान थम चुका था , जैसे नदी का जल साफ हो चुका था। उसने सोचा समझा कि ,सच्चे उत्तर बाहर नहीं उसके भीतर हैं ,उसने बुद्ध के चरणों में सर झुकाए और कहा प्रभु आज मुझे पहली बार लगा कि मेरी प्रश्नों के उत्तर मिल गए हैं ,मैं अब और प्रार्थनाएं नहीं करूंगा ।मैं अभ्यास करूंगा स्वयं पर ध्यान दूंगा । बुद्ध मुस्कुराए और बोले बस यही सच्ची पूजा है ,जब मन शांत हो ,जब विचार शुद्ध हो और हृदय में कोई ईर्ष्या न हो, तब ईश्वर तुम्हारे भीतर ही प्रकट होते हैं
Buddha vs Bhagwan-यह कहानी कुछ हमें तथ्य सिखाती है जैसे ,
•ईश्वर पर विश्वास गलत नहीं है ,लेकिन ईश्वर को चमत्कार की दुकान समझना मूर्खता है।
•स्वयं के दुख और शांति को शांत करना ,स्वयं के पास से होता है ना किसी और के पास
•कर्म ही वास्तविक पूजा है ,जो जैसा करेगा वैसा पाएगा।
• अनुभव और आत्मनिरीक्षण बुद्ध का मार्ग है ईश्वर को बाहर मत खोजो।
• अगर मन शांत और पवित्र हो तो ईश्वर तुम्हारे भीतर प्रकट हो सकते हैं।
Buddha vs Bhagwan-
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धन्यवाद,
जय हिंद

Matlab ek kaam ko dil se karo na ki bas ho jaye