बंदर और लकड़हारा की कहानी

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बंदर और लकड़हारा की कहानी: मोंटू की शरारत और जीवन की बड़ी सीख

 

परिचय

‘बंदर और लकड़हारा की कहानी’ पंचतंत्र की एक बहुत प्रसिद्ध बाल-कथा है। इसमें मोंटू नाम का एक चंचल बंदर बिना सोचे-समझे लकड़हारे की नकल करता है और लकड़ी के तने में फंसा कील निकाल देता है, जिससे तना बंद हो जाता है और उसके पैर उसमें फंस जाते हैं। लकड़हारा सही समय पर आकर उसकी जान बचाता है। इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि बिना सोचे-समझे किसी की अंधी नकल नहीं करनी चाहिए, बल्कि हर काम के पीछे का कारण समझना चाहिए।

बंदर और लकड़हारा की कहानी
बंदर और लकड़हारा की कहानी का दृश्य

मोंटू की आदत और लकड़हारा

बहुत समय पहले विजय नगर के घने और विशाल जंगल के किनारे एक छोटा-सा शांत गाँव बसा हुआ था। गाँव और जंगल की सीमा पर मीठे रसीले आमों, जामुन और महुवा का एक बहुत पुराना बगीचा था। उस घने जंगल में चंचल हिरण, नाचते मोर, तोते और खरगोश मिलकर रहते थे। उसी जंगल में बंदरों का भी एक बड़ा और संगठित झुंड रहता था। उसी झुंड में मोंटू नाम का एक अत्यंत चंचल, शरारती और मनमौजी बंदर रहता था। मोंटू दिल का बुरा नहीं था, लेकिन उसमें एक बहुत ही अजीब आदत थी।वह बिना सोचे-समझे हर किसी की नकल करने लगता था।

एक दिन जब एक मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहा था, तो मोंटू भी डाल पर चढ़कर अजीब-अजीब हरकतें करने लगा। यह देखकर पास बैठा एक बूढ़ा बंदर मुस्कुराया और बोला, “अरे मोंटू! जरा संभलकर भाई। दूसरों की नकल करने में मजा तो बहुत आता है, लेकिन कभी-कभी बिना सोचे-समझे नकल करना भारी पड़ सकता है।” मोंटू ने एक पका हुआ जामुन मुँह में डालते हुए लापरवाही से कहा, “दादा! आप भी न खामखां चिंता करते रहते हैं। देखिए, मोर नाच रहा है तो मैं भी थोड़ा हाथ-पैर हिला रहा हूं बस। इसमें भला क्या खतरा हो सकता है?” बूढ़े बंदर ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, “बेटा, आज तो बात सिर्फ नाचने की है, लेकिन जिस दिन तुम किसी ऐसे काम की नकल करोगे जिसके बारे में तुम्हें कुछ पता ही नहीं है, उस दिन समझ आएगा।” पर मोंटू ने उसकी बात को हँसी में उड़ा दिया।

तभी जंगल के किनारे रामू नाम का एक मेहनती लकड़हारा आया। वह रोज गाँव से आता था और सूखी लकड़ी इकट्ठी करके बाज़ार में बेचता था। उस दिन रामू एक गिरे हुए शीशम के बहुत बड़े और भारी तने के पास जा पहुंचा। उसने अपने गमछे से माथे का पसीना पोंछा, कुल्हाड़ी निकाली और तने पर प्रहार करना शुरू किया—ठक! ठक! ठक! मोंटू बरगद के पेड़ की निचली डाल पर आ बैठा और उत्सुकता से देखने लगा। बंदर और लकड़हारा की कहानी में यह जंगल अनेक जानवरों का घर था, जहा हर दिन नई घटना घटती रहती थीं।

मोंटू ने अपने मन में सोचा, “वाह! यह आदमी तो कितनी आसानी से लोहे के टुकड़े से इतने बड़े तने को काट रहा है। इसमें ऐसी कौन-सी बड़ी कला है? अगर मुझे मौका मिले, तो मैं भी चुटकियों में यह लकड़ी काटकर पूरे जंगल को दिखा सकता हु ,कि मैं कितना होशियार हूं ” रामू ने घंटों मेहनत की, जिससे तने के बीच एक गहरी दरार बन गई। दरार को खुला रखने के लिए रामू ने अपने थैले से एक मजबूत लकड़ी की कील निकाली और उसे दरार के बीचों-बीच फंसाकर कुल्हाड़ी से ठोंक दिया। अब दरार खुली रही और लकड़ी काटना आसान हो गया। इस बंदर और लकड़हारा की कहानी का मुख्य पात्र मोंटू बंदर तने के पास जाने का मौका ढूंढने लगा।

मोंटू का संकट

उसी दोपहर की कड़क धूप में काम करते-करते रामू थक गया था। उसके पेट में चूहे कूद रहे थे। उसने अपनी कुल्हाड़ी ज़मीन पर रखी और पास के नीम के पेड़ की छाँव में बैठकर जलपान करने लगा और अपनी रोटी-सब्ज़ी खाने लगा। जैसे ही मोंटू ने देखा कि लकड़हारा दूर चला गया है, उसने अपने मन से कहा, “यही सही मौका है! अब मैं सबको अपनी ताकत और समझदारी दिखाऊँगा” बंदर और लकड़हारा की कहानी का यह मोड़ बेहद दिलचस्प है, जब मोंटू चुपके से पेड़ से नीचे उतरा।

मोंटू धीरे-धीरे तने के पास पहुँचा। उसने सबसे पहले रामू की भारी कुल्हाड़ी उठाने की कोशिश की, लेकिन वह इतनी भारी थी कि मोंटू खुद डगमगाकर गिर पड़ा। उसने खुद को संभाला और बड़बड़ाया,  कुल्हाड़ी तो बहुत भारी है। कोई बात नहीं, मैं सीधे इस लकड़ी को ही दो टुकड़ों में अलग कर देता हूं” वह तने के ऊपर बैठ गया। जब उसकी नज़र बीच में फंसी लकड़ी की कील पर पड़ी, तो उसने सोचा, “यह लकड़हारा भी कितना भुलक्कड़ है! काम पूरा करने के बजाय इस बेकार की कील को बीच में फँसाकर भूल गया। अगर मैं इसे निकाल दूँ,तो यह लकड़ी अपने आप अलग हो जाएगी।”

मोंटू ने कील को पकड़ा और खींचने लगा। कील नहीं हिली। मोंटू को गुस्सा आ गया, “ऐसे कैसे नहीं निकलेगी? मैं भी देखता हूँ ” उसने अपने पैर तने के दोनों तरफ जमाए, दोनों हाथों से कील पकड़ी, दांत भींचे और पूरी ताकत से झटका दिया—आवाज आई चटाक!

कील बाहर निकल आई। मोंटू अभी खुशी से झूमने ही वाला था कि अगले ही पल तने के दोनों भारी हिस्से भयंकर दबाव के साथ आपस में बंद हो गए। दुर्भाग्य से, मोंटू के पैर उसी दरार के अंदर थे! “अरे बाप रे बचाओ… बचाओ! कोई है? मुझे बाहर निकालो!” मोंटू दर्द से चीख उठा। उसकी चीख से पूरा जंगल जाग उठा। बंदर और लकड़हारा की कहानी में मोंटू की नादानी तब सामने आई जब उसने बिना कारण समझे उस लकड़ी की कील को दोनों हाथों से पकड़कर खींच दिया।

बंदरों का झुंड नीचे आया। एक छोटा बंदर घबराकर बोला, “मोंटू भाई! यह क्या हो गया? हम तुम्हें कैसे निकालें?” तभी वही बूढ़ा बंदर आगे आया और दुखी होकर बोला, “मोंटू! हमने तुम्हें कितनी बार समझाया था कि दूसरों का काम केवल बाहर से देखने में आसान लगता है। बिना कारण समझे हाथ डालोगे, तो यही अंजाम होगा।” मोंटू रोते हुए गिड़गिड़ाया, “दादा! मुझे माफ कर दो, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई… पर पहले मुझे इस दर्द से बचा लो, मेरे पैर पिस रहे हैं!”

लकड़हारे द्वारा बचाव

शोर सुनकर रामू लकड़हारा हाथ में डंडा लिए दौड़ा हुआ आया। जब उसने मोंटू को तने में फंसा और ज़मीन पर कील पड़ी देखी, तो वह हैरान रह गया। बंदर और लकड़हारा की कहानी में लकड़हारे का मानवीय रूप सामने आया ,जब उसने बिना देरी किए अपनी कुल्हाड़ी उठाई। उसने कुल्हाड़ी से तने को थोड़ा उचकाया और कील को दोबारा अंदर ठोंक दिया। दरार खुलते ही उसने मोंटू को बहुत ही प्यार से संभाला और बाहर निकाला।

मोंटू लंगड़ाते हुए तुरंत पेड़ पर चढ़ गया। उसके पैरों पर नीले निशान पड़ गए थे। वह शर्मिंदगी से मुँह छिपाने लगा। रामू ने कुल्हाड़ी ज़मीन पर रखी, ऊपर देखा और बड़े स्नेह से मुस्कुराते हुए कहा, “क्यों छोटे दोस्त! आ गया मज़ा? तुमने तो सोचा होगा कि लकड़ी काटना बच्चों का खेल है?”

मोंटू ने रोते हुए हाथ जोड़े और कहा, “मुझे माफ कर दीजिए, भैया! मुझे लगा कि आप गलती से वह कील वहां भूल गए हैं। मुझे नहीं पता था कि वह कील ही लकड़ी को खुला रख रही थी।” रामू ने नरमी से समझाया, “देख भाई, गुस्सा मुझे बहुत आया था, लेकिन तुम्हारी यह हालत देखकर दया आ गई। मैंने वह कील इसलिए लगाई थी ताकि लकड़ी बंद न हो। किसी भी काम को देखकर उसकी नकल करने से पहले यह सोचना चाहिए कि इंसान वह काम ‘क्यों’ और ‘कैसे’ कर रहा है। बिना सोचे-समझे कूद पड़ोगे,तो उस काम में जान भी जा सकती है।” मोंटू ने सिर झुकाकर कहा, “आपने आज मेरी जान बचाई है। मैं आपसे वादा करता हूँ कि आज के बाद बिना समझे कभी किसी काम में हाथ नहीं लगाऊंगा” रामू ने अपना सामान समेटा और जाते-जाते बोला, “चलो, देर से ही सही, पर तुमने एक अच्छी सीख ली। अपना ध्यान रखना!”

इस बंदर और लकड़हारा की कहानी से मोंटू को अपने जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला। उस दुर्घटना के बाद मोंटू पूरी तरह बदल गया।

मोंटू में बड़ा बदलाव

उस दुर्घटना के बाद मोंटू में अद्भुत बदलाव आया। अब वह जल्दबाजी कोई कदम नहीं उठाता था। कुछ दिनों बाद, जब एक तेज़ हिरण एक पतले अनजान रास्ते पर दौड़ा, तो मोंटू उसके पीछे भागने ही वाला था, पर वह तुरंत रुका। उसने पास बैठे मोर से पूछा, “मोर भाई! यह हिरण इतनी तेज़ी से उस रास्ते पर क्यों जा रहा है? क्या वहां कोई ख़तरा है?” मोर ने बताया, “हां मोंटू, आगे दलदल है। हिरण तो हल्का है इसलिए निकल जाता है, लेकिन अगर तुम गए तो फंस जाओगे।” मोंटू ने राहत की सांस ली और कहा, “शुक्र है! आज अगर मैंने पहले की तरह बिना सोचे छलांग लगा दी होती, तो फिर मुसीबत में पड़ जाता।”

एक दिन दो छोटे बंदर एक चमकीले लाल फल को खाने ही वाले थे। मोंटू ने दौड़कर उन्हें रोका और प्यार से कहा, “रुक जाओ, छोटे! इस फल को मत खाओ।” छोटा बंदर मुँह बनाकर बोला, “क्यों मोंटू भैया? देखिए न, यह कितना सुंदर और मीठा लग रहा है!” मोंटू ने उनके सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया, “मेरे भाई, हर सुंदर दिखने वाली चीज़ अच्छी नहीं होती। पहले यह पता करते हैं कि यह खाने लायक है भी या नहीं।” जब बूढ़े बंदरों से पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि वह जहरीला फल था। दोनों छोटे बंदरों ने मोंटू को गले लगा लिया और कहा, “अगर आज आप न होते मोंटू भैया, तो हमारा क्या होता! आप सच में बहुत समझदार हैं।”

बच्चों के लिए बंदर और लकड़हारा की कहानी केवल एक मनोरंजक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह सीख देती है कि बिना सोचे-समझे नकल करना भारी पड़ सकता है। आज भी बंदर और लकड़हारा की कहानी पंचतंत्र की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक मानी जाती है। शिक्षक और अभिभावक अक्सर बंदर और लकड़हारा की कहानी के माध्यम से बच्चों को विचार शीलता और सतर्कता का पाठ पढ़ाते हैं। यदि आप बंदर और लकड़हारा की कहानी को गहराई से समझें, तो यह हमें अपनी गलतियों से सीखकर आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती है।

शाम के समय मोंटू उसी बरगद की डाल पर बैठा था। पास आकर बूढ़े बंदर ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “देखा मोंटू! एक समय था जब तुम बिना सोचे नकल करते थे, और आज तुम दूसरों की जान बचा रहे हो। मुझे तुम पर गर्व है।” मोंटू ने मुस्कुराते हुए कहा, “दादा, उस दिन अगर लकड़हारे भैया ने मुझे न समझाया होता, तो मैं कभी यह सीख नहीं पाता।” यह बंदर और लकड़हारा की कहानी हमें सिखाती है कि असली समझदारी अंधी नकल करने में नहीं, बल्कि हर कार्य के पीछे छिपे कारण को जानने में है। यही कारण है कि बंदर और लकड़हारा की कहानी हर पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक बनी हुई है। अंततः, बंदर और लकड़हारा की कहानी का संदेश हमेशा याद रखने योग्य है।

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कहानी की सीख(Moral)

बंदर और लकड़हारा की कहानी हमें यही सिखाती है ,की दूसरों की नकल बिना समझे नहीं करनी चाहिए। किसी भी काम को करने से पहले उसके तरीके और कारण को समझना जरूरी है।

बंदर और लकड़हारा की कहानी यह भी बताती है। की जैसे बच्चे हमेशा एक दूसरे की नकल करने की कोशिश करते रहते है जैसे उनके कपड़े,जूते, लाइफस्टाइल और भी बहुत कुछ। यह नहीं समझ पाते कि कुछ चीजें जिनके बारे में आप नहीं जानते वह सही नहीं है।

“इसलिए हमेशा कहते है,देखो, समझो और फिर करो,सिर्फ नकल मत करो”

 

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धन्यवाद, जय हिंद 

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