लालची कुत्ता की कहानी | Panchatantra Story in Hindi | लालच का फल
नमस्कार दोस्तों! मैं गुलाब कुमार – आपका स्वागत करता हूं www.HindiStories24.com पर, हम आपके लिए लाते हैं ऐसी सच्ची, प्रेरणादायक और दिल को छू लेने वाली हिंदी कहानियाँ, जो सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा सीखने के लिए होती हैं।
आज की कहानी भी बिल्कुल ऐसी ही है। सफलता, संघर्ष और जीवन की एक बड़ी सीख से भरी हुई। इसे आसान और अपने पन वाली भाषा में लिखा गया है, ताकि पढ़ते-पढ़ते लगे जैसे कोई अपना किस्सा सुना रहा हो।
तो चलिए, बिना समय गंवाए शुरू करते हैं, आज की शानदार लालची कुत्ता की कहानी।

लालची कुत्ता और कछुआ का दृश्य
एक घने जंगल के किनारे एक छोटा-सा विजय नगर नाम का गाँव था। गांव के पास ही एक शांत नदी बहती थी। नदी के किनारे हरे-भरे पेड़, रंग-बिरंगे फूल और घास उगी हुई थी। उसी गाँव में कालू नाम का एक कुत्ता रहता था।
कालू देखने में बहुत मजबूत और फुर्तीला था। वह तेज दौड़ सकता था और अपनी सूंघने की शक्ति से दूर की चीजों का भी पता लगा लेता था। गाँव के लोग उसे कभी-कभी खाना दे देते थे, लेकिन कालू की एक आदत बहुत खराब थी,वह जरूरत से ज्यादा पाने की हमेशा कोशिश करता था।उसके लिए चाहे जो करना पड़े।
अगर उसे एक रोटी मिलती, तो वह दूसरी रोटी के पीछे भागता। अगर कोई उसे दूध देता, तो वह किसी दूसरे के घर से भी दूध पाने की कोशिश करता। गाँव के सभी किसान अक्सर कहते, कालू अच्छा कुत्ता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसका लालच है।
कालू था ,तो जानवर लेकिन उसे सब समझ आता था,कालू सबकी बात सुनता, लेकिन कभी गंभीरता से नहीं लेता। एक दिन सुबह कालू गाँव के बाहर घूम रहा था। तभी उसे नदी के किनारे एक छोटी-सी दुकान दिखाई दी। वहाँ एक कसाई ने ताजा मांस काटकर रखा था।
मांस की खुशबू कालू की नाक तक पहुँची ,तो उसकी आँखें चमक उठीं।वह धीरे-धीरे दुकान के पास गया। कसाई किसी ग्राहक से बात कर रहा था। मौका देखकर कालू ने झट से मांस का एक बड़ा टुकड़ा उठाया और वहाँ से भाग गया।
कालू बहुत खुश था।उसने सोचा,आज तो मेरी दावत है! इतना बड़ा मांस का टुकड़ा मुझे रोज रोज़ कहा मिलता है? वह नदी की तरफ दौड़ पड़ा। नदी पार करने के लिए वहाँ लकड़ियों से बना एक पुराना पुल था।
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पानी में दिखा दूसरा कुत्ता
कालू पुल पर चढ़ गया।चलते-चलते अचानक उसने नदी के साफ पानी में नीचे देखा। उसे पानी में एक और कुत्ता दिखाई दिया। उस कुत्ते के मुँह में भी मांस का एक बड़ा टुकड़ा था। कालू रुक गया। कालू नीचे देखा और मन ही मन सोचा ,अरे! इसके पास तो मेरे जैसा ही मांस है। अगर मैं इसका मांस भी ले लूं, तो मेरे पास दो टुकड़े हो जाएंगे।
असल में पानी में दिखाई देने वाला कुत्ता कोई दूसरा कुत्ता नहीं था। वह कालू की अपनी परछाईं थी। लेकिन लालच में डूबे कालू को यह समझ नहीं आया।उसने सोचा, मुझे अपना मांस तो मिल ही गया है। अगर मैं जोर से भौंककर उस कुत्ते को डरा भगा दूं,तो शायद वह अपना मांस छोड़ देगा।”
कालू ने मुँह खोला और जोर जोर से भौंका भौं भौ..जैसे ही उसने मुँह खोला, उसके मुँह का मांस नदी में गिर गया। मांस पानी में गिरते ही तेज धारा में बह गया। कालू घबरा गया। वह नीचे पानी में देखने लगा। पर न अपना मांस था और न ही वह दूसरा कुत्ता।
अब उसे समझ आया कि जिसे वह दूसरा कुत्ता समझ रहा था, वह उसकी अपनी परछाईं थी। कालू बहुत दुखी हुआ। वह पुल के किनारे बैठ गया और सोचने लगा।मेरे पास पहले से एक अच्छा मांस का टुकड़ा था। मैं उसी से खुश रहता तो आज भूखा नहीं बैठा होता। दूसरे के मांस के लालच में मैंने अपना मांस भी खो दिया।
कछुआ आया कालू के पास
कुछ देर बाद नदी के किनारे रहने वाला एक बूढ़ा कछुआ वहाँ आया। उसने कालू को उदास देखा तो पूछा,कालू, आज इतने परेशान क्यों हो?” कालू ने पूरी बात कछुए को बता दी।
कछुआ मुस्कुराया और बोला,तुमने आज एक बड़ी सीख बहुत महंगी कीमत देकर सीखी है। कालू ने सिर झुकाकर पूछा,“कौन-सी सीख?”
कछुआ बोला, जो हमारे पास है, उसकी कीमत समझे बिना जब हम उससे अधिक पाने के पीछे भागते हैं, तो कई बार हमारे हाथ में जो है वह भी चला जाता है।
कालू चुपचाप कछुए की बात सुनता रहा। कछुए ने आगे कहा,
जरूरत और लालच में बहुत अंतर होता है। जरूरत कहती है।मुझे जितना चाहिए, उतना मिल जाए। लेकिन लालच कहता है।जो मिला है, उससे भी ज्यादा चाहिए। और यही लालच इंसान हो या जानवर, उसे गलत फैसला लेने पर मजबूर कर देता है।
कालू को हुआ एहसास
कालू को अपनी गलती अच्छी तरह समझ आ गई।उसने कछुए से कहा, आज से मैं अपनी जरूरत के अनुसार ही खाना खाऊंगा और जो मेरे पास है, उसके लिए आभारी रहूंगा। कछुआ मुस्कुराया। यही समझदारी है।
उस दिन के बाद कालू में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। जब कोई उसे रोटी देता, तो वह पहले उसे खाता और फिर दूसरी रोटी के लिए इधर-उधर नहीं भागता। अगर उसे किसी घर से दूध मिल जाता, तो वह दूसरे घर में चोरी करने की कोशिश नहीं करता।
गाँव वालों ने भी कालू में आया बदलाव देख लिया। एक दिन वही बूढ़ा किसान, जो हमेशा कालू के लालच की शिकायत करता था, उसे खाना देने आया। उसने कालू के सामने दो रोटिया रखीं। कालू ने एक रोटी खाई और दूसरी रोटी को वहीं छोड़ दिया।
किसान ने आश्चर्य से पूछा, क्या हुआ कालू? आज दूसरी रोटी नहीं चाहिए? कालू ने पूंछ हिलाई और दूसरी रोटी गाँव के एक छोटे भूखे पिल्ले के पास ले गया। किसान यह देखकर बहुत खुश हुआ।
उसने कहा,अब तुम सचमुच समझदार हो गए हो। कालू ने आसमान की तरफ देखा। उसे नदी वाला दिन याद आ गया। कालू को समझ आ चुका था कि खुशी ज्यादा चीजें जमा करने में नहीं, बल्कि जो मिला है उसकी कद्र करने में है।
कालू फिर से नदी के पास आया
कुछ दिनों बाद कालू फिर उसी पुल के पास आया।वह पुल पर खड़ा होकर नदी को देखने लगा। पानी में उसकी परछाईं दिखाई दे रही थी।
कालू मुस्कुराया और बोला,अब मैं तुम्हारे धोखे में नहीं आने वाला!नदी की लहरों में उसकी परछाईं हिलने लगी, जैसे वह भी मुस्कुरा रही हो।
कालू वहाँ से संतोष के साथ वापस गाँव लौट गया।उस दिन के बाद गाँव में जब भी कोई बच्चा किसी चीज के लिए जरूरत से ज्यादा जिद करता, तो बूढ़ा किसान उसे कालू लालची कुत्ता की कहानी सुनाता और कहानी के अंत में हमेशा कहता। लालच में मिला हुआ सपना अक्सर हाथ में मौजूद सच्चाई भी छीन लेता है। हमेशा खुश रहें जो मिला है।
Moral / सीख
हमें लालची कुत्ता की कहानी से सिखने की जरूरत है,अपनी जरूरत और इच्छाओं के बीच अंतर समझना चाहिए। जो हमारे पास है, उसकी कद्र करने वाला व्यक्ति ज्यादा सुखी रहता है। अधिक पाने के लालच में हम कभी-कभी अपने पास मौजूद मूल्यवान चीज भी खो देते हैं।
यह लालची कुत्ता की कहानी यह भी सिखाती है,की हमेशा
“लालच बुरी बला” है ,इसके साये में जो आयेगा उसका जीवन सफल नहीं हो पाएगा। जैसे कालू के साथ हुआ ,लेकिन कालू समझ गया। ऐसा जीवन में कभी मौका आए तो खुद को समझा लेना।
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धन्यवाद, जय हिंद



