कछुआ और खरगोश की कहानी|Panchatantra Story in Hindi|Friendship story
दिलचस्प कहानी दो दोस्तों की
हमने पहले भी कछुआ और खरगोश की कहानी पढ़ी और सुनी होगी।लेकिन यह कहानी थोड़ी अलग है ,आपको पढ़कर मजा आएगा, इसलिए चलते है, कहानियों की जादुई नगरी पर…
कछुआ और खरगोश दृश्य
बहुत समय पहले एक सुंदर और हरे-भरे जंगल में दो अनोखे दोस्त रहते थे। एक था तेज़, फुर्तीला और चंचल खरगोश चीकू, और दूसरा था शांत, धैर्यवान और बुद्धिमान कछुआ धीमाराम। दोनों का स्वभाव बिल्कुल अलग था, लेकिन दोस्ती बहुत गहरी थी।
जंगल के बाकी जानवर अक्सर उनकी दोस्ती देखकर हैरान होते थे। हिरण कहता, इतना तेज़ खरगोश और इतना धीमा कछुआ दोस्त कैसे हो सकते हैं? लेकिन चीकू हमेशा मुस्कुराकर कहता, दोस्ती चाल से नहीं, दिल से होती है।
ऐसे ही दिन मजे से बीत रहे थे,फिर एक साल गर्मी बहुत ज़्यादा पड़ी। जंगल का बड़ा तालाब सूखने लगा। पेड़ों की पत्तियां मुरझाने लगीं और छोटे जानवर प्यास से परेशान रहने लगे। हर दिन पानी कम होता जा रहा था।
जंगल में सभा
एक शाम जंगल की सभा बुलाई गई। वहां हाथी, हिरण, बंदर, मोर, गिलहरी और दूसरे जानवर इकट्ठा हुए। सब बस यही चर्चा कर रहे थे, की अब जब सब सुख जाएगा तब क्या करेंगे,तब बूढ़े तोते ने कहा, पहाड़ के उस पार एक बड़ा झरना है ,जहा सालभर पानी रहता है, लेकिन वहा तक जाने का रास्ता बहुत खतरनाक है। तकलीफ हो सकती है।
तभी चीकू तुरंत बोला, मैं अभी जाकर रास्ता देख आता हू। धीमाराम ने कहा, अकेले मत जाओ। मुश्किल रास्तों में जल्द बाज़ी नहीं, समझदारी काम आती है।
जल्दबाजी में फैसला
अगली सुबह दोनों यात्रा पर निकल पड़े। रास्ते में घना जंगल था। पेड़ों की ऊंची शाखाएँ सूरज की रोशनी को भी मुश्किल से ज़मीन तक आने देती थीं। चलते-चलते उन्हें एक भूखी लोमड़ी मिली। उसने मीठी आवाज़ में कहा, मित्रों, झरने का रास्ता इस तरफ है। लोमड़ी उन्हें मंजिल से भटकना चाहती थी।

कछुआ और खरगोश और लोमड़ी दृश्य
चीकू बिना सोचे उस दिशा में बढ़ने लगा। धीमाराम ने ज़मीन पर ध्यान से देखा। वहा इंसानों के पैरों के निशान और टूटी हुई रस्सी पड़ी थी। उसने धीरे से कहा, रुको! यह रास्ता सही नहीं है।
कुछ दूर जाकर उन्होंने देखा कि वहा शिकारी का जाल बिछा था। अगर खरगोश अकेला जाता तो उसमें फंस जाता। चीकू शर्मिंदा होकर बोला, अगर तुम साथ नहीं होते, तो मैं आज मुसीबत में पड़ जाता।
धीमाराम मुस्कुराया, हर चमकती चीज़ सही रास्ता नहीं होती। दोनों आगे बढ़े। रास्ते में एक तेज़ बहती नदी मिली। खरगोश लंबी छलांग लगाने लगा, लेकिन उसका पैर फिसल गया। वह पानी में गिरते-गिरते बचा।
नदी का रास्ता
धीमाराम ने नदी के किनारे बड़े पत्थरों का रास्ता देखा और बोला, धीरे धीरे चलो, सुरक्षित पहुंच जाओगे। दोनों नदी पार कर गए।
दोपहर होते-होते वे एक बड़े आम के पेड़ के नीचे पहुंचे। वहा बंदरों का झुंड बैठा था। बंदरों ने उन्हें मीठे आम दिए और कहा, आगे पहाड़ी रास्ता है। सावधान रहना। थोड़ी दूर जाते ही उन्हें शिकारी की आवाज़ सुनाई दी। चीकू घबरा गया और तेज़ दौड़ने लगा।
धीमाराम ने कहा, भागो मत! इस झाड़ी के पीछे छिप जाओ। दोनों झाड़ियों में छिप गए। शिकारी उनके पास से निकल गया, लेकिन उन्हें देख नहीं पाया।
चीकू ने राहत की सांस ली। अब शाम होने लगी थी। पहाड़ की चढ़ाई शुरू हुई। खरगोश तेज़ी से ऊपर भागा, लेकिन थककर बैठ गया। दूसरी ओर धीमाराम धीरे-धीरे चलता रहा और बिना रुके ऊपर जा पहुंचा ।
ऊपर जाकर दोनों ने एक अद्भुत झरना देखा। साफ़, ठंडा पानी चट्टानों से बह रहा था। दोनों ने पानी पिया और खुशी से झूम उठे। लेकिन तभी उन्होंने देखा कि झरने के पास एक छोटा हिरण का बच्चा कीचड़ में फंसा हुआ है। उसकी माँ रो रही थी।
चीकू ने पूरी ताकत लगाई, लेकिन अकेले उसे नहीं निकाल पाया।धीमाराम ने आसपास पड़ी मजबूत बेलें इकट्ठा की। उसने बेलों को बांधकर कर एक लंबी रस्सी बनाई। खरगोश और कछुआ ने मिलकर उस रस्सी से बच्चे को बाहर निकाल लिया।
सभी जानवर खुश हो गए। हिरणी ने आंसू भरी आँखों से कहा, आज तुम दोनों ने मेरे बच्चे की जान बचा ली।
तालाब में पानी
अब सबसे बड़ा काम बाकी था पूरे जंगल तक पानी पहुंचाना था। धीमाराम ने सुझाव दिया कि सभी जानवर मिलकर झरने से तालाब तक एक छोटी पानी की नाली बनाए।
अगले दिन पूरा जंगल काम में लग गया। हाथी मिट्टी हटाने लगे, बंदर पेड़ की डालिया साफ़ करने लगे, खरगोश छोटे पत्थर हटाने लगा और गिलहरियां मिट्टी भरने लगीं।
कई दिनों की मेहनत के बाद झरने का पानी जंगल के तालाब तक पहुंच गया। धीरे-धीरे सूखा तालाब फिर से भरने लगा।
पेड़ हरे हो गए। पक्षी लौट आए। छोटे जानवर खुशी से खेलने लगे सभा में जंगल के राजा हाथी ने कहा, आज जंगल को बचाने का श्रेय किसी एक की ताकत को नहीं, बल्कि धैर्य, बुद्धि और मिलकर काम करने की भावना को जाता है।

कछुआ और खरगोश और उनके दोस्तों का दृश्य
चीकू सबके सामने खड़ा हुआ और बोला, मैं हमेशा सोचता था कि तेज़ होना सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन आज मैंने सीखा कि धैर्य और समझदारी बिना शोर किए सबसे बड़ा काम कर सकती है। धीमाराम ने मुस्कुराकर कहा, तेज़ चलना अच्छी बात है, लेकिन सही दिशा में चलना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
उस दिन से जंगल के सभी जानवर किसी भी कठिन काम में जल्द बाज़ी करने के बजाय सोच-समझकर निर्णय लेने लगे धीमाराम कछुआ और खरगोश चीकू की दोस्ती पहले से भी मजबूत हो गई। दोनों रोज़ झरने के किनारे बैठते और नए जानवरों को यही सीख देते कि सच्ची जीत रफ़्तार की नहीं, समझदारी और धैर्य की होती है।
कहानी की सीख (Moral)
कछुआ और खरगोश की कहानी से हमे सीखने को मिलता है,की धैर्य, समझदारी और सही निर्णय कई बार तेज़ी से भी बड़ी ताकत होते हैं। सच्चा दोस्त वही है जो सही समय पर सही सलाह दे, और मिलकर काम करने से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान निकल सकता है।
जैसे आज जीवन में हम सभी को एक सच्चा दोस्त बनाने की तलाश होंगी चाहिए।कभी भी जीवन में तकलीफ हो तो सही रास्ता दिखाए। जैसे इस कहानी कछुआ और खरगोश में कछुए समय समय पर खरगोश को रास्ता दिखाया।
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धन्यवाद, जय हिंद



